मालवा का वैष्णो देवी मंदिर:एक ही पाषाण पर मौजूद हैं माता की तीन स्वयंभू प्रतिमाएं
जिले में हर तरफ नवरात्र की रौनक है। गांव से लेकर शहर तक माता कि मंदिरों में दर्शनार्थियों का तांता लगा हुआ है। इस दौरान मालवा की वैष्णो देवी के नाम से प्रसिद्ध दिग्ठान गांव स्थित माता की मंदिर पर सैकड़ों की संख्या में भक्त पहुंच रहे है। मान्यता है कि इस मंदिर पर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की हर मुराद पूरी होती है। इस मंदिर का इतिहास भी बेहद रोचक है। मालवा की वैष्णो देवी माता वैष्णो देवी का नाम आते ही जहन में जम्मू के कटरा में स्थित मां वैष्णो देवी के मंदिर का दृश्य उभर कर आ जाता है। पहाड़ पर स्थित इस मंदिर में माता महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती पिंडी स्वरूप में मौजूद है। धार जिला मुख्यालय से तकरीबन 25 किमी दूर एक गांव दिग्ठान है। इस गांव में स्थित माता के एक मंदिर को मालवा की वैष्णो देवी के नाम से जाना जाता है। मंदिर में एक ही पाषाण पर माता की तीन आदम कद प्रतिमाएं मौजूद है। ये स्वयंभू प्रतिमाएं महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में स्थित है। दिग्ठान का ये माता मंदिर न सिर्फ धार जिले में बल्कि पूरे मध्यप्रदेश में मालवा की वैष्णो देवी के नाम से विख्यात है। प्रतिदिन इस मंदिर में बड़ी संख्या में दर्शनाथी्र आते है लेकिन नवरात्र में यहां आने वाले दर्शनार्थियों की संख्या हजारों में होती है। आसपास के क्षेत्रों के अलावा अन्य शहरों और प्रदेशों से भी दर्शनाथी यहां आते है। दांगुल नदी से निकली प्रतिमाएं मान्यता है कि मंदिर में स्थित प्रतिमाएं दांगुल नदी से निकली थी। दांगुल नदी में एक पत्थर पर गांव का एक धोबी कपड़े धोता था। एक दिन रात्रि में उस धोबी को माता का सपना आया कि इस पाषाण पर मेरी प्रतिमाएं है मुझे यहां से निकालो और स्थापित करो। धोबी ने माता के स्वप्न की बात गांव के जागीरदार को बताई। उसके बाद उस पाषाण को नदी से निकलवाया गया। पाषाण पर माता की तीन प्रतिमाएं मौजूद थी। जब इस पाषाण को गांव में स्थित लक्ष्मी नारायण बड़े मंदिर पर ले जाया जाने लगा तो तालाब से कुछ ही दूर आकर पाषाण रुक गया। बैलगाड़ी, घोड़े और हाथी से भी पाषाण को खींचने की कोशिश की गई, लेकिन सारे प्रयास विफल हो गए। यह देखते हुए गांव के जागीरदार ने उसी स्थान पर माता प्रतिमाओं की स्थापना करवा दी। पूरी होती है मन्नतें माता का यह मंदिर प्राचीन होने के साथ ही सिद्ध भी है। यहां आने वाले भक्तों की हर मन्नत पूरी होती है। मन्नत मांगने वाले भक्त मंदिर में उल्टा स्वास्तिक बना कर अपनी मन्नत मांगते है और पूरी होने पर सीधे स्वास्तिक का निर्माण कर माता को प्रसाद और चुनरी भेंट करते है। चुनरी यात्राएं निकालकर पहुंचते है भक्त नवरात्र के नौ दिनों में आसपास के कई गांवों के लोग चुनरी यात्राएं निकालकर दिग्ठान माता मंदिर आते है। प्रतिदिन आने वाली इन चुनरी यात्राओं की संख्या एक से अधिक होती है। जिसमें सैकड़ों की संख्या में पुरुष और सिर पर कलश लिए महिलाएं शामिल होती है।
जिले में हर तरफ नवरात्र की रौनक है। गांव से लेकर शहर तक माता कि मंदिरों में दर्शनार्थियों का तांता लगा हुआ है। इस दौरान मालवा की वैष्णो देवी के नाम से प्रसिद्ध दिग्ठान गांव स्थित माता की मंदिर पर सैकड़ों की संख्या में भक्त पहुंच रहे है। मान्यता है कि इस मंदिर पर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की हर मुराद पूरी होती है। इस मंदिर का इतिहास भी बेहद रोचक है। मालवा की वैष्णो देवी माता वैष्णो देवी का नाम आते ही जहन में जम्मू के कटरा में स्थित मां वैष्णो देवी के मंदिर का दृश्य उभर कर आ जाता है। पहाड़ पर स्थित इस मंदिर में माता महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती पिंडी स्वरूप में मौजूद है। धार जिला मुख्यालय से तकरीबन 25 किमी दूर एक गांव दिग्ठान है। इस गांव में स्थित माता के एक मंदिर को मालवा की वैष्णो देवी के नाम से जाना जाता है। मंदिर में एक ही पाषाण पर माता की तीन आदम कद प्रतिमाएं मौजूद है। ये स्वयंभू प्रतिमाएं महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में स्थित है। दिग्ठान का ये माता मंदिर न सिर्फ धार जिले में बल्कि पूरे मध्यप्रदेश में मालवा की वैष्णो देवी के नाम से विख्यात है। प्रतिदिन इस मंदिर में बड़ी संख्या में दर्शनाथी्र आते है लेकिन नवरात्र में यहां आने वाले दर्शनार्थियों की संख्या हजारों में होती है। आसपास के क्षेत्रों के अलावा अन्य शहरों और प्रदेशों से भी दर्शनाथी यहां आते है। दांगुल नदी से निकली प्रतिमाएं मान्यता है कि मंदिर में स्थित प्रतिमाएं दांगुल नदी से निकली थी। दांगुल नदी में एक पत्थर पर गांव का एक धोबी कपड़े धोता था। एक दिन रात्रि में उस धोबी को माता का सपना आया कि इस पाषाण पर मेरी प्रतिमाएं है मुझे यहां से निकालो और स्थापित करो। धोबी ने माता के स्वप्न की बात गांव के जागीरदार को बताई। उसके बाद उस पाषाण को नदी से निकलवाया गया। पाषाण पर माता की तीन प्रतिमाएं मौजूद थी। जब इस पाषाण को गांव में स्थित लक्ष्मी नारायण बड़े मंदिर पर ले जाया जाने लगा तो तालाब से कुछ ही दूर आकर पाषाण रुक गया। बैलगाड़ी, घोड़े और हाथी से भी पाषाण को खींचने की कोशिश की गई, लेकिन सारे प्रयास विफल हो गए। यह देखते हुए गांव के जागीरदार ने उसी स्थान पर माता प्रतिमाओं की स्थापना करवा दी। पूरी होती है मन्नतें माता का यह मंदिर प्राचीन होने के साथ ही सिद्ध भी है। यहां आने वाले भक्तों की हर मन्नत पूरी होती है। मन्नत मांगने वाले भक्त मंदिर में उल्टा स्वास्तिक बना कर अपनी मन्नत मांगते है और पूरी होने पर सीधे स्वास्तिक का निर्माण कर माता को प्रसाद और चुनरी भेंट करते है। चुनरी यात्राएं निकालकर पहुंचते है भक्त नवरात्र के नौ दिनों में आसपास के कई गांवों के लोग चुनरी यात्राएं निकालकर दिग्ठान माता मंदिर आते है। प्रतिदिन आने वाली इन चुनरी यात्राओं की संख्या एक से अधिक होती है। जिसमें सैकड़ों की संख्या में पुरुष और सिर पर कलश लिए महिलाएं शामिल होती है।